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चंद्रमा और उससे पार का लक्ष्‍य

  • Trajectory for Chandrayaan-2

चंद्रयान की कुशल ट्रेकिंग एवं प्रबंधन (मैन्‍यूवरिंग) मिशन की सफलता के लिए महत्‍वपूर्ण है ।  भा.प्रौ.सं मुंबई से एक कुशल एवं निम्‍न लागत ट्रेकिंग एल्‍गोरिथम इसका समाधान हो सकता है । मंगल आर्बिटर मिशन (एमओएम) जिसे मंगलायन के नाम से भी जाना गया, की हाल ही की सफलता अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में एवं राष्‍ट्र की अनुसंधान क्षमताओं के लिए विशिष्‍ट उपलब्धि रही ।  अपनी सफलता की लहर को जारी रखने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ, इसरो दूसरे लूनर (चन्‍द्रमा संबंधी) मिशन, चंद्रायान-2 को वर्ष 2016 के अंत तक या 2017 के प्रारंभ में लांच करने की योजना बना रहा है ।  अंतरिक्ष मिशन किसी देश द्वारा किए जा सकने वाले सर्वाधिक प्रौद्योगिकी एवं गहन अनुसंधान परियोजनाओं में से है ।  चंद्रायान-2 में एक आर्बिटर, एक लैंडर और एक लूनर शेवर होगा ।  कई अत्‍यधिक जटिल प्रणालियों को इस प्रकार पूर्णत: सिंक्रोनाइजेशन में कार्य करना होगा कि परियोजना का सफलतापूर्वक प्रचालन एवं निष्‍पादन सुनिश्चित हो सके ।  जैसे ही अंतरिक्षयान बाहरी अंतरिक्ष में पहुंचता है सेटेलाइट नेवीगेशन मिशन का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा बन जाता है ।  सेटेलाइट नेवीगेशन सिस्‍टम का मूल कार्य अंतरिक्षयान की स्थिति एवं वेग के बारे में पूर्व सूचना देना है ।  अंतरिक्षयानों की कुशल ट्रेकिंग हेतु एवं यदि आवश्‍यक हो तो प्रक्षेप पथ सुधार (ट्रेजेक्‍टरी करेक्‍शन) की दिशा में कदम उठाने के उद्देश्‍य से तथा इसे वास्‍तविक समय में सटीकता के साथ करने के लिए नवीन विधियॉं खोजने हेतु अत्‍यधिक अनुसंधान किया गया है ।  एम.टेक. विद्यार्थी सनत कुमार विश्‍वास और प्राध्यापक हबलानी, वायु आकाश विभाग, भा.प्रौ.सं मुंबई ने इस प्रकार का नेवीगेशन सिस्‍टम विकसित करने की कठिन चुनौती को स्‍वीकार किया जिसे चंद्रायान-2 मिशन के लिए उपयोग में लाया जा सके ।  सनत की परियोजना, जब  अंतरिक्षयान उड़ान अवस्‍था में हो, उस समय ग्राउंड स्‍टेशनों (अंतरिक्षयान ट्रांसमीशन के माध्‍यम से) द्वारा एकत्रित किए गए डाटा का उपयोग करके अंतरिक्ष यान के प्रक्षेप पथ (ट्रेजेक्‍टरी) की पूर्व सूचना देने वाले एल्‍गोरिथम निर्माण पर केंद्रित है ।  यह कार्य सिसलूनर ट्रेजेक्‍टरी के सिमूलेशन के साथ आरम्‍भ हुआ, यह मानते हुए कि अंतरिक्षयान इसका अनुसरण करेगा ।  अंतरिक्ष में किसी चीज की ट्रेजेक्‍टरी के सिमूलेशन के लिए आवश्‍यक है कि इस पर कार्य करने वाले बलों की प्रकृति एवं परिमाण (मैग्‍नीट्यूड) का ज्ञान हो ।  इस विशिष्‍ट समस्‍या के लिए पहचाने गए बड़े बल सूर्य, चन्‍द्रमा और पृथ्‍वी एवं सौर विकिरण दबाव के गुरूत्‍वीय बल थे । इन बलों के प्रभाव को मापना उनकी जटिल अरैखिक (नॉन-लीनियर) प्रकृति के कारण कठिन था ।  अत: J2 नाम का अधिक जटिल मॉडल उपयोग किया गया जिसे पूर्ण गोलाकार मानने के बजाय नॉन-स्‍पहेरिकल और अनियमित आकार का समझा गया ।ट्रेजेक्‍टरी के सिमूलेशन (अनुकार) के बाद, अगला कदम अंतरिक्ष से उसी प्रकार का डाटा  प्राप्‍त करने के लिए सिमूलेशन को रन करना था जिस प्रकार का डाटा ग्राउंड स्‍टेशन द्वारा अंतरिक्ष यान से प्राप्‍त किया जाएगा ।  ऐसे सिगनल ग्राउंड स्‍टेशन तक पहुंचने से पहले विरूपित एवं विकृत हो जाते हैं, अत: विकृति एवं त्रुटि के स्रोत भी समान रूप से ध्‍यान में रखे गए ।  कार्य में ग्राउंड स्‍टेशनों द्वारा एकत्रित डाटा से नेवीगेशन के लिए दो आवश्‍यक पैरामीटर – अंतरिक्षयान की स्थिति एवं वेग का आंकलन किया जाना भी शामिल था ।  लेखकों ने विद्युत चुंबकीय तरंगों की परिमित गति के कारण संदेश के प्रसारण और इसकी प्राप्ति के बीच में समय की देरी को भी ध्‍यान में रखा ।  इस कार्य से प्राप्‍त परिणाम असाधारण थे ।  चंद्रमा पर पहुंचने के समय स्थिति और वेग में अंतिम त्रुटि क्रमश: 30 किलोमीटर एवं 1.5 मीटर/सैकण्‍ड की थी ।  यद्यपि त्रुटि ट्रेजेक्‍टरी के दैर्ध्‍य की दृष्टि से निम्‍न है, लेखक विश्‍वास करते हैं कि इसमें सुधार की गुंजाइश है और इन्‍हें एल्‍गोरिथम एप्‍लीकेशन तैयार करने के लिए शामिल किया जा सकता था ।  ये परिणाम उच्‍च स्‍तरीय कम्‍प्‍यूटेशनल सुविधाओं का उपयोग किए बिना प्राप्‍त किए गए थें ।  निपटान के समय और अधिक कम्‍प्‍यूटेशनल क्षमता का उपयोग करके, एल्‍गोरिथम में अधिक जटिल एवं स‍टीक मॉडल शामिल किए जा सकते हैं ।  (‘एडवांसेज इन कंट्रोल, ऑप्‍टीमाइजेशन ऑफ डाइनेमिक सिस्‍टम’ विषय पर सम्‍मेलन में प्रस्‍तुत किया, एसीओडीएस-2012,बंगलुरू, भारत, डीओआई : 10.13140/2.1.1492.6726) इमेज कर्टसे : http://www.chandrayaan-i.com/index.php/chandrayaan-2/chandrayaan-2-how.html प्रकाशित कार्य से लिंक :  विश्‍वास एस.के., हबलानी एच.बी., लूनर ट्रैजेक्‍टरीज ऑफ स्‍पेसक्राफ्ट फोर नेवीगेशन, विद एप्‍लीकेशन टू चंद्रायान-2

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